नई दिल्ली, 20 जून.
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज आपातकाल की याद दिलाते हुए कहा कि तब सर्वोच्च न्यायालय ने देश के नौ उच्च न्यायालयों के आपातकाल सम्बन्धी फैसले को पलटते हुए सरकार के पक्ष में ऐसा फैसला सुनाया जो दुनिया में किसी भी न्यायिक संस्था और कानून के शासन में विश्वास करने वालों के इतिहास में सबसे काला फैसला होगा।
नई दिल्ली के वाइस प्रेसिडेंट एन्क्लेव में राज्यसभा इंटर्नशिप प्रोग्राम (आरएसआईपी-7) के 7वें बैच के प्रतिभागियों से बातचीत करते हुए, श्री धनखड़ ने कहा, "25 जून, 1975 की आधी रात थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर भारत के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए और देश के 100,000 से ज़्यादा नागरिकों को कुछ ही घंटों में सलाखों के पीछे डाल दिया गया।"
लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "लोगों को उनके घरों से घसीटकर बाहर निकाला गया और पूरे देश में जेलों को भर दिया गया। हमारा संविधान खत्म हो गया। हमारे मीडिया को बंधक बना लिया गया। कुछ प्रतिष्ठित अख़बारों के संपादकीय खाली थे।"
गिरफ़्तार किए गए लोगों का खौफ़नाक विवरण साझा करते हुए उन्होंने कहा, "ये लोग कौन थे जिन्हें अचानक सलाखों के पीछे डाल दिया गया? उनमें से कई इस देश के प्रधानमंत्री बने - अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर जी। उनमें से कई मुख्यमंत्री, राज्यपाल, वैज्ञानिक और प्रतिभाशाली लोग बने।"
न्यायपालिका की भूमिका पर बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, "वह ऐसा समय था जब संकट के समय लोकतंत्र का मूल तत्व बिखर गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने आपातकाल और मौलिक अधिकारों के मामले में देश के नौ उच्च न्यायालयों के फैसलों को पलटकर एक काला फैसला सुनाया। फैसला यह था कि यह कार्यपालिका की इच्छा है कि वह जितने समय के लिए उचित समझे, आपातकाल जारी रखे।"
उन्होंने कहा “आपातकाल के दौरान कोई मौलिक अधिकार नहीं होते। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस भारत में तानाशाही, अधिनायकवाद और निरंकुशता को वैधता प्रदान की।" इसलिए हमारे गणतंत्र के 75वें वर्ष में, वर्तमान सरकार ने 11 जुलाई, 2024 को एक गजट अधिसूचना द्वारा आधिकारिक रूप से घोषणा की कि 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।
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