अजयभान सिंह
रायपुर, 22 सितम्बर। साल 2021 का आखिरी महीना था जब नई दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत में आयकर विभाग द्वारा दायर एक अभियोग पत्र यानि ‘प्रोसीक्यूशन कंप्लेंट’ मेरे हाथ लगा। हालाँकि 997 पृष्ठ का यह अभियोग पत्र तत्कालीन आईएएस अनिल टुटेजा, शराब कारोबारी अनवर ढेबर, तब के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सर्वशक्तिमान उपसचिव सौम्या चौरसिया और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ दायर किया गया था।
तथापि उसमे बघेल के पुत्र चैतन्य उर्फ़ बिट्टू को लेकर न केवल अच्छी खासी चर्चा की गयी थी बल्कि कई व्हाट्सऐप चैट के स्क्रीनशॉट के ज़रिये यह सिद्ध करने की कोशिश भी की गयी कि बिट्टू इस पूरे खेल में एक्स्ट्रा खिलाड़ी नहीं बल्कि आल राउंडर की भूमिका में थे। हालाँकि तब मैंने ‘स्टेट्समैन’ में बिट्टू के बारे में कुछ भी लिखना वाज़िब नहीं समझा। शायद इसलिए कि किसी भी एजेंसी ने उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं की थी।
वक्त का पहिया तबसे काफी आगे बढ़ चुका है और फिलवक्त, वह ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की गिरफ्त में जेल में हैं और तमाम घोटालों के अंतिम लाभार्थी के रूप में उनके खिलाफ 9 हजार पेज की चार्ज शीट अदालत में दाखिल की जा चुकी है। मीडिया में कच्ची-पक्की ढेरों ख़बरें उनके बारे में छप चुकी हैं। ऐसे में अब मैं नैतिक रूप से खुद को उनके बारे में लिखने के लिए स्वतंत्र पा रहा हूँ।

नमस्कार, ‘द वक्ता’ में आज की पड़ताल का विषय है शराब, कोयला, डीएमएफ अदि घोटाले और उनमें बिट्टू की भूमिका। अपनी राय को किनारे रखकर कुछ उपलब्ध तथ्यों की बुनियाद पर इस पूरी पहेली को अलग-अलग तरीके से समझने की कोशिश करते हैं। मुख्यमंत्री का पुत्र होने के बावजूद उनकी कम आयु और इस तरह के गोरखधंधों में अनुभव की स्पष्ट कमी को देखते हुए कोई भी यह अनुमान आसानी से लगा सकता है कि अपने पिता की पोजीशन की वजह से संभवतः वह अनचाहे ही इस झमेले में फंस गए होंगे।
लेकिन ईडी अपनी चार्जशीट में कुछ और इशारा कर रही है। ED लिखती है, “और इस सिंडिकेट के शीर्ष पर खड़े थे तब के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के पुत्र श्री चैतन्य बघेल। उनकी भूमिका महज प्रतीकात्मक नहीं बल्कि निर्णायक और निर्देशात्मक थी। वह इस सिंडिकेट द्वारा एकत्र किये जा रहे तमाम अवैध धन के हिसाब-किताब के लिए जिम्मेदार थे। इस धन के संग्रह और वितरण से जुड़े तमाम बड़े फैसले उनके निर्देश पर ही लिए जाते थे। मुख्यमंत्री का पुत्र होने की वजह से वह इस सिंडिकेट के नियंत्रक और अंतिम प्राधिकारी बन गए थे। “

अभियोग पत्र में आगे कहा गया है कि, “पीएमएल अधिनियम 2002 के तहत दर्ज़ ईसीआईआर क्रमांक RPZO/ 04/2024 में यह स्थापित हो गया है कि शराब घोटाले से मिले एक हजार करोड़ रूपये चैतन्य बघेल ने व्यक्तिगत रूप से हैंडल किये। उन्होंने जानबूझकर इस सिंडिकेट के बाकी सदस्यों के षड़यंत्र में शामिल होकर अपराध से अर्जित धन को एकत्र करने और छिपाने में सहयोग किया।
शराब घोटाले से बाहर जाकर पड़ताल करने के पहले हम थोड़ा ‘पप्पूजी’ यानी भूपेश बघेल के निकटतम मित्र लक्ष्मीनारायण बंसल के ईडी को दिए गए बयानों की तरफ रुख करते हैं। बंसल ने एजेंसी को बताया कि उन्होंने चैतन्य बघेल के साथ मिलकर शराब घोटाले से अर्जित करीब एक हजार करोड़ रूपये खपाये।
इसमें से एक बड़ी धनराशि प्रदेश कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल को भेजी गयी जबकि 80 से 100 करोड़ रुपये बिलासपुर के तांत्रिक के के श्रीवास्तव को दिए गए। मजे की बात ये है कि इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा गिरफ्तार हो गया लेकिन रामगोपाल अग्रवाल की हस्ती कुछ ऐसी है कि उनको ढूंढने में ईडी, सीबीआई और राज्य की पुलिस का दम निकला जा रहा है। इस रियायत के पीछे जो रिश्ता काम कर रहा है उससे भी अमूमन सब लोग वाकिफ ही हैं।
अब चर्चा का रुख करते हैं घोटालों की इस श्रृंखला के एक अन्य वर्टिकल यानि कोयला घोटाले की तरफ। लेकिन उसके पहले एक चुटीला सा सुभाषित हो जाये। ईडी की इसी चार्जशीट में एक व्हाट्सऐप चैट का स्क्रीनशॉट दिया गया है, जिसमें मुख़्यमंत्री की सर्वशक्तिमान सहयोगी सौम्या चौरसिया बघेल के सबसे बड़े सिपहसालार अनिल टुटेजा से कह रही हैं कि वो एडी (अनवर ढेबर) से कहें कि वो पप्पू बंसल को शराब के पैसों का हिसाब न दे। क्योंकि बिट्टू को यह पसंद नहीं। जवाब में अनिल टुटेजा एक सुभाषित लिखते हैं “क**ना, बहुत सर चढ़ गया है, टिपिकल मारवाड़ी ***ना”।

बहरहाल, पाठकों को याद होगा कि केंद्रीय एजेंसियों की आमद का यह सिलसिला फरवरी 2020 में अनिल टुटेजा, सौम्या चौरसिया, विवेक ढांढ, अनवर ढेबर और अन्य लोगों पर आयकर छापों से शुरू हुआ था. इन छापों के दौरान ढेबर और टुटेजा के मोबाइल से रिकवर की गयी व्हाट्सऐप चैट से कोयला, शराब, डीएमएफ और नान घोटाले से जुड़े कई विस्फोटक रहस्य उजागर हुए। उन सब खुलासों पर किसी और समाचार-कथा में तफ्सील से चर्चा करेंगे। लेकिन बिग-बॉस वाले किस्से को अभी बयां कर देना मौजूं होगा।
आयकर विभाग के अभियोग पत्र में बिगबॉस नाम के एक व्हट्सएप्प ग्रुप चैट का स्क्रीन-शॉट दिया गया है। इस ग्रुप में सौम्या चौरसिया और बिट्टू के अलावा चार लोग और थे। इनमें से एक सज्जन का नाम पुष्कर चैतन्य सौम्या के मोबाइल में सेव था। ईडी का आरोप है कि इस ग्रुप में पैसे की उगाही आदि की चर्चा की जाती थी।
ग्रुप में एक जगह सौम्या लिखती हैं कि “जय विल गिव यू मनी”। जय यानी उनके निज सचिव जय कोसले। थोड़ी देर बाद पुष्कर लिखता है की (एमपी के) हनी-ट्रैप कांड में छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अधिकारी रजत कुमार का भी नाम है। अब यहाँ किस्सा थोड़ा ट्विस्ट होता है, कहानी फ्लैशबैक से वापस वर्तमान के कैनवास पर दौड़ने लगती है।
हुआ यूँ कि ईडी ने जैसे ही इस स्क्रीनशॉट को अभियोग पत्र में शामिल किया, तो औपचारिक और अनौपचारिक रूप से प्रदेश की सत्ता को रौंद रहे 2005 बैच के अफसरों को झुरझुरी होने लगी। वजह ये कि सलोने से रजत कुमार भी 2005 के हैं। रजत का नाम ख़राब न हो इसके लिए पूरा अमला मैदान में आ गया। मैदान में आने तक तो ठीक था, लेकिन इसके लिए उन्होंने एक बलि का बकरा भी ढूंढ़ लिया।

एक नयी थ्योरी गढ़ी गयी, अख़बारों में छपवाया गया कि दरअसल, इस तरह की कपोल-कल्पित परीकथाएं उस आईपीएस अफसर की डायरी से ली गयी हैं जो पिछले साल ही ससम्मान बहाल हुए हैं। कसम से कमाल का कथानक गढ़ा था, बस कॉमन-सेंस से चूक गए 2005 वाले साहिबान। और DPR वाले साहिबान भी। वो इसलिए कि जिस आईपीएस की डायरी को लेकर शिगूफा छेड़ा जा रहा है वो डायरी 29 जून 2021 को उनके खिलाफ केस दर्ज़ होने के बाद बरामद की गयी और कमाल देखिये कि उसके किस्सों का ज़िक्र सौम्या-चैतन्य के बिगबॉस ग्रुप में 2020 में ही हो गया।
खैर, यह तो हुआ अवांतर का विषय। फिर से चलते हैं फ्लैशबैक में। सूर्यकान्त तिवारी याद है न, भूले तो नहीं होंगे। जैसे अनवर ढेबर, टुटेजा की सरपरस्ती में शराब घोटाले के वर्टिकल को लीड कर रहे थे, ठीक उसी तरह सौम्या की देखरेख में सूर्यकान्त कोयला-लेवी, डीएमएफ और परिवहन में तकरीबन 700 करोड़ रूपये के वसूली नेटवर्क के कर्ताधर्ता बने हुए थे। रोशन सिंह, निखिल चंद्राकर और मुइनुद्दीन आदि सूर्यकांत के उगाही नेटवर्क के पुर्ज़े हुआ करते थे। हम यहाँ निखिल चंद्राकर की बात कर रहे हैं, क्योंकि सूर्यकांत के इस पूरे नेटवर्क को चलाने में उसका बड़ा हाथ हुआ करता था।
केवल 12 वीं तक पढ़े रोशन चंद्राकर ने गत 16 जुलाई 2025 को EOW-ACB को दिए अपने इकबालिया बयान में बताया कि सूर्यकांत के पास लेवी वसूली का जितना भी धन इकट्ठा होता था उसकी पाई-पाई का हिसाब रजनीकांत तिवारी एक डायरी में करता था। इस डायरी की हर महीने सौम्या चौरसिया बारीकी से जांच करती थी। सौम्या के अलावा सूर्यकांत को हर महीने सीएम के बेटे बिट्टू बघेल को भी हिसाब देना पड़ता था।
रोशन कहता है कि वो खुद एक-दो बार सूर्यकांत के साथ बिट्टू बघेल से मिलने गया था। सिर्फ इतना ही नहीं, रोशन के मुताबिक 2020-21 में एक बार बिट्टू और सूर्यकांत के बीच हिसाब किताब को लेकर नोंकझोंक भी हुई और वापस लौटते वक्त इससे झल्लाए सूर्यकांत ने उससे यहां तक कहा कि ,"इतना भी क्या यार, छोटे छोटे अमाउंट का भीं हिसाब मांगता है बिट्टू। ये शोभा नहीं देता"I

अब आते हैं कथानक के अगले हिस्से पर। अभी तक हमने जाना कि ईडी ने शराब घोटाले के नियंता और लाभार्थी के रूप में चैतन्य को गिरफ्तार किया। लेकिन कोल लेवी, डीएमएफ स्कैम में उनकी भूमिका को लेकर अब तक ईडी ने कुछ नहीं कहा है। अलबत्ता निखिल के बयान के बाद EOW-ACB को वो आधार मिल गया है जिसके चलते उनपर सवाल खड़े किए जा सकते हैं।
शराब घोटाले में तो EOW-ACB ने उनके खिलाफ मामला दायर भी कर रखा है। आपको जानकर अचरज होगा कि ईओडब्ल्यू-एसीबी की प्राथमिकी की बुनियाद पर ही ईडी ने चैतन्य को गिरफ्तार किया है। क्योंकि ईडी सीधे किसी के खिलाफ मामला दायर नहीं कर सकती उसके लिए पहले से संबंधित व्यक्ति के खिलाफ एक विधेय अपराध (Predicate Offence) का होना जरूरी है।
खैर, यहां अचरज खत्म नहीं होता बल्कि यहां से आपको भाजपा सरकार में भूपेश बघेल की धमक का कुछ कुछ अंदाजा लगेगा। जिस शराब घोटाले में कथित मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में चैतन्य को ईडी ने जेल में डाल रखा है उसी के प्रीडिकेट ऑफेंस में छत्तीसगढ़ की एसीबी-ईओडब्ल्यू ने उन्हें पूछताछ के लिए एक नोटिस देना तक गवारा नहीं समझा। आपको लग सकता है कि नोटिस नहीं दिया तो नहीं दिया, उसमें क्या समस्या है?

कानून के जानकार मानते हैं कि अगर विधेय अपराध में पूछताछ तक नहीं हुई है तो ईडी चैतन्य को कैसे गिरफ़्तार कर सकती है। हाइकोर्ट में दो मिनट में ज़मानत मंजूर हो जाएगी। नव-भूपेशवादी ठीक यही तो चाहते हैं। इसी का तो अलिखित समझौता हुआ था सेजबहार स्थित गुलशन वाटिका में वर्तमान भाजपा सरकार की पुलिस के एक बड़े कर्ताधर्ता और पुराने मुखिया के बीच। आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि नव-भूपेशवादी शब्द हाल ही में अफसरों की मनमानी से तमतमाए एक बहुत बड़े भाजपा नेता ने मजाक मजाक में बोला था। मुझे ठीक लगा तो उल्लेख कर दिया।
बहरहाल, ये पूरा मामला अब एक बड़े फलक पर चल रहे सस्पेंस थ्रिलर जैसा ही गया है, जहां दुरभिसंधियों का अबूझ मकड़जाल फैला हुआ है। जो जिसके साथ दिखाई दे रहा है उसकी निष्ठा उस व्यक्ति के साथ न होकर कहीं और है। कैनवास के एक बड़े हिस्से में खड़ी है भाजपा और उसकी तथाकथित सरकार। दूसरी तरफ खड़े हैं भूपेश बघेल और उनकी थोड़ी बिखरी हुई सी कांग्रेस पार्टी। जो छत्तीसगढ़ के आज के हालात को समझते हैं उन्हें खूब पता है कि कांग्रेस के ज्यादातर नेता भूपेश के साथ नहीं हैं और सरकार को अपनी मनमर्जी से चला रहे अफसर भाजपा के साथ नहीं हैं।
बल्कि, अगर यूं कहें तो ज्यादा मुफीद होगा कि इस सरकार के सबसे शक्तिशाली अफसर पूरी निष्ठा के साथ भूपेश के साथ खड़े हैं। आप इसे भूपेश बघेल की हनक कहें, उनकी पूंजी कहें या उनका भय कहें, लेकिन प्रकारांतर से अफसरों के माध्यम से चल तो उन्हीं की रही है। कहने की जरूरत नहीं कि 2005 बैच के एक IPS अफसर जो कांग्रेस शासन काल में SSP होते हुए भी डिफेक्टो डीजीपी कहलाते थे, वो सत्ता के नाभि केंद्र में बैठे 2005 के अपने एक अत्यंत शक्तिशाली बैचमेट के सहारे पर्दे के पीछे से खेल रहे हैं। दिलचस्प है कि यह सारा खेल भाजपा को मटियामेट करने और कांग्रेस को पुनर्जीवन देने के मकसद से किया जा रहा है लेकिन भाजपा के कर्णधारों को इसकी संजीदगी का ज़रा भी अनुमान नहीं है।
भूपेश के करीबी समझे जाने वाले ऐसे अफसर पूरी हनक के साथ भाजपा के एजेंडे को पलीता लगा रहे हैं। इनकी ताकत इतनी है कि पूरा संगठन और संघ एक तरफ और ये एक तरफ। तब भी इनका ही पलड़ा भारी पड़ता है। भाजपा की दुर्दशा को समझने के लिए आप तमाम मीडिया संस्थानों में जमे भूपेश प्रेमियों से ही लगा सकते हैं।
डीपीआर नाम का महकमा तो ऐसा लगता है कि भूपेश बघेल सदा के लिए कांग्रेस के नाम लिख गए हैं। यूं मीडिया के बारे में कुछ लिखने बोलने से अपन भरसक बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन अगर कभी समीचीन लगा लगा तो भूपेशवादी मीडिया पर भी खुल कर चर्चा होगी।
फिलहाल बस इतना ही, नमस्कार।
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